
कुष्ठ रोग, फाईलेरिया और चर्म रोग की मरीजो मे बेहताशा बढ़ोत्तरी
सारंगढ़ विकासखंड़ में 700 से अधिक चर्म रोगी,
सारंगढ़ में कुष्ठ रोग 193, फाईलेरिया 93 प्रकरण
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले मे कुष्ठ रोगी सर्वाधिक,
तालाबो की गंदगी के कारण से नरकीय जीवन जीने मजबूर शहरवासी
सारंगढ़,
सारंगढ़ को तालाबो का शहर कहा जाता है नगर पालिका क्षेत्र सारंगढ़ में 15 तालाब है किन्तु निस्तारी के लिये उपयोग होने वाले इस प्रमुख तालाबो मे गंदगी का सराबोर होने के कारण से यही तालाब अब चर्म रोग सहित कुष्ठ रोग और फाईलेरिया रोग के संक्रमण के मुख्य कारण हो गये है। समय रहते अगर सारंगढ़ के तालाबो को नही संवारा गया तो चर्म संबंधित रोगो का संक्रमण से शहरवासी परेशान हो जायेगें।
सारंगढ़ नगर पालिका के 15 वार्डो के 23 हजार से अधिक आबादी के निस्तारी के लिये तालाबो का भरपूर उपयोग किया जाता है किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि चर्म रोग और कुष्ठ रोग सहित कई प्रकार के संक्रामित रोग फाईलेरिया आदि रोग के फैलने का एक मात्र कारण तालाबो की गंदगी है। इस मामले मे मुख्य स्वास्थ और चिकित्सा अधिकारी डां.एफ.आर.निराला ने स्वीकार किया कि सारंगढ़ अंचल में तालाबो में सीवरेज का पानी आने और साफ-सफाई नही होने के कारण से दूषित पानी का ठहराव इन तालाबो मे काफी है तथा इसी के कारण से सारंगढ़ में कई प्रकार की बिमारियो का प्रसार हो रहा है। वही इस मामले मे नगर पालिका के सीएमओ मनीष गायकवाड़ ने बताया कि तालाबो की स्वच्छता के लिये शीघ्र ही प्रस्ताव बनाकर शासन को प्रेषित किया जायेगा। इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार नवगठ़ित सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में सर्वाधिक संख्या में कुष्ठ रोगी पाये जाते है वही फाईलेरिया के भी मरीजो की संख्या काफी ज्यादा है। सूत्रो से मिली जानकारी के अनुसार सारंगढ़ अंचल में 193 कुष्ठ के मरीज तथा 93 फाईलेरिया पाये गये है। वही चर्म रोग से भी संबंधित मरीजो की संख्या सारंगढ़ विकासखंड़ में 700 के ऊपर है। ऐसे में सारंगढ़ और ग्रामीण अंचल मे चर्म रोग सहित कुष्ठ रोग और फाईलेरिया के मरीजो की संख्या फिर से बढ़ने लगी है। इस बिमारियो के प्रसार के लिये जिम्मेदारी तालाबो की साफ-सफाई को जिम्मेदार बता रहे है। बताया जा रहा है कि सारंगढ़ मे तालाबो की इंजिनियरिंग आजादी के पहले से ही काफी मजबूत रही थी सारंगढ़ शहर में पानी की आवक वर्षाकाल मे मुड़ा तालाब मे होती थी तथा जलभराव 100 फीसदी होने के बाद ओव्हरफ्लो पानी नेंगी तालाब मे जाता था वह भी 100 फीसदी भरने पर ओव्हरफ्लो पानी खाड़ाबंद तालाब और उसका लबालब होने पर नया तालाब जाता था। नया तालाब का पानी पूर्ण भरने पर विशेष नाली के द्वारा पानी तुर्की तालाब और उसके बाद गर्जना तालाब से होते हुए लोहारिन डबरी तालाब मे जाता था। इस इंजिनियरिंग के कारण से शहर के तालाबो के पानी मे प्रवाह जारी रहता था तथा ठहराव कम होने के कारण से पानी दूषित नही होता था। किन्तु अब बस स्टैंड के पास से तुर्की तालाब के लिये आने वाला पानी का नाली को बंद करा दिया गया है जिसके कारण से तालाबो में पानी का यह इंजिनियरिंग मुडा तालाब, नेंगी तालाब, खाड़ाबंद तालाब और नया तालाब तक सिमित हो गया है। वही तुर्की तालाब, गर्जना तालाब और लोहारिन डबरी इससे बाहर हो गये। बताया जा रहा है कि तालाबो में हो रही गंदगी के कारण से शहर में कई प्रकार से रोगो का संक्रमण हो रहा है। तुर्की तालाब मे निस्तारी का पानी आकर मिल रहा है तथा यहा पर भी काफी संख्या में शहरवासी निस्तारी का उपयोग करते है। ऐसे मे दूषित पानी के कारण से चर्म रोग तथा फाईलेरिया रोग का फिर से प्रभाव सारंगढ़ मे बढ़ने की संभावना बलवती हो रही है।
बताया जा रहा है कि सारंगढ़ शहर की बढ़ती आबादी और अतिक्रमण के कारण तालाबों में पानी भरने के रास्ते बंद हो गए हैं। इसके कारण तालाबों की स्थिति दयनीय हो गई है। पूर्व में तालाबों के सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों खर्च किए गए, पर हकीकत कुछ और है। लोग गंदे व बदबूदार पानी में नहाने को मजबूर हैं। प्राचीन समय में ख्याति हासिल की हुई शहर की मुख्य तालाबों का अस्तित्व खत्म सा हो गया है।कभी पूरे शहर को पीने का शुध्द पानी देने वाली तालाबें इन दिनों शहरवासियों को चर्म रोग,फाइलेरिया और हाइड्रोसिल जैसे बीमारियों परोस रही है। बावजूद जनप्रतिनिधि व समाज सेवी संस्थान इन तालाबों की सुध नहीं ले रहे हैं। शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके में पांच तालाब हैं। जहां शहरवासी रोज स्नान, पूजा,त्योहार के समय विभिन्न आयोजनों में लोगों की भीड़ जुटती है,जो अनदेखी के कारण दूषित हो गई हैं। शहरी क्षेत्र में कुल 15 वार्ड की करीब 23 हजार आबादी के लिए 15 तालाब हैं। इन तालाबों में गंदगी और दूषित पानी से लोग निस्तारी करते हैं। कई वार्डों में गरीब तबका के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। उन्हें निस्तारी के लिए तालाब जाना पड़ता है। नगर के लोगों ने बताया कि उन्हें नहाने में परेशानी होती है, आसपास सफाई नहीं होने से पानी और भी गंदा हो रहा है। पालिका,जनप्रतिनिधियों सहित लोगों में सफाई को लेकर कोई जागरूकता नहीं है। कई लोग तो इसमें कूड़ा-कचरा भी डाल देते हैं,यही नही कइयों के घर का शौचालय का निस्तारी इसी तालाब की ओर है। नगर पालिका के अधिकारी जनप्रतिनिधि तालाबों की सफाई पर ध्यान नहीं दे रहे। इसके चलते तालाब के घाट कूड़ादान में तब्दील हो चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग की माने तो तालाब की सफाई व पानी स्थिर रहने के कारण चर्म रोग जैसी बीमारियां जिले में अत्यधिक है।जिसके लिए लोगों को जागरूक होने की आवश्यकता है।
फाइलेरिया क्या है?
फाइलेरिया दुनिया भर में विकलांगता और विरूपता बढ़ाने वाला सबसे बड़ा रोग है (इसे एक संक्रमण के रूप में भी देखा जाता है)। यह एक पैरासाइट डिजिट है जो कि धागे के समान दिखाई देने वाले निमेटोड कीड़ों (Nematode Worms) के शरीर में प्रवेश करने की वजह से होती है। निमेटोड कीड़े परजीवी मच्छरों की प्रजातियों (Wuchereria Bancrofti or Rugia Malayi) और खून चूसने वाले कीटों के जरिए इंसान के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इन निमेटोड कीड़ों में फिलेरी वुचरेरिअ बैंक्रोफ्टी (Filariae-Wuchereria Bancrofti), ब्रूगिआ मलाई (Brugia Malayi) और ब्रूगिआ टिमोरि (Brugia Timori) शामिल है। फाइलेरिया मुख्य रूप से वुचरेरिअ बैंक्रोफ्टी (Wuchereria Bancrofti) परजीवी कीड़े की वजह से होता है।
दुनिया भर में फाइलेरिया मुख्य रूप से गरीब लोगों और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। फाइलेरिया को फीलपाँव (Elephantiasis), श्लीपद (slippad) के नाम से जाना जाता है। भारत में इसे सामान्य तौर पर हाथी पाँव के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस रोग में व्यक्ति का पाँव हाथी के पाँव की तरह हो जाता है। भारत सरकार का भारतीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (Indian Ministry of Health and Family Welfare) इस रोग से लड़ने वालों के लिए मुफ्त उपचार प्रदान करता हैं। अकेले भारत में ही करोड़ों लोगों को फाइलेरिया होने का जोखिम हैं। निमेटोड परजीवी, मच्छरों और अन्य खून पीने वाले जीवों या कीड़ों की मदद से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते हैं और फिर फाइलेरिया हो जाता है।