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188 करोड़ की सड़क, निर्माण पूरा होने का दावा फिर भी अधूरी! NH-130A पर सीमेंट से पैचवर्क, गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था कटघरे में

188 करोड़ की सड़क, निर्माण पूरा होने का दावा फिर भी अधूरी! NH-130A पर सीमेंट से पैचवर्क, गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था कटघरे में

188 करोड़ की सड़क, निर्माण पूरा होने का दावा फिर भी अधूरी! NH-130A पर सीमेंट से पैचवर्क, गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था कटघरे में

बिलासपुर-मुंगेली राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माण पूरा होने के बाद भी मरम्मत का सिलसिला जारी, डामर सड़क पर सीमेंट-कंक्रीट से हो रही रिपेयरिंग ने खड़े किए सवाल; ठेकेदार को दो बार नोटिस, जिम्मेदार अधिकारियों के पास भी नहीं पूरी जानकारी

बिलासपुर। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि किसी राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़क निर्माण कार्य पूरा होने के कुछ समय बाद ही मरम्मत मांगने लगे, जरूरी संकेतक और सुरक्षा इंतजाम अधूरे रहें और जिम्मेदार अधिकारियों को परियोजना की बुनियादी जानकारी तक न हो, तो सवाल उठना लाजिमी है। बिलासपुर से मुंगेली होते हुए जबलपुर की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग NH-130A की स्थिति कुछ ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े कर रही है। करीब 188 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली बिलासपुर-मुंगेली सड़क पर कहीं रिपेयरिंग हो रही है, तो कहीं मील स्टोन, दिशा सूचक बोर्ड, रोड मार्किंग और रेट्रो-रिफ्लेक्टिव जैसे जरूरी सुरक्षा इंतजामों की कमी सामने आ रही है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि डामर की सड़क पर मेंटेनेंस के नाम पर सीमेंट-कंक्रीट से पैचवर्क किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़क की यह हालत क्यों है और इसकी जवाबदेही किसकी है?

निर्माण पूरा होने का दावा, फिर सड़क पर मरम्मत की नौबत क्यों?

बिलासपुर-मुंगेली NH-130A की लगभग 30.8 किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण के लिए ठेकेदार और एनएच विभाग के बीच 26 दिसंबर 2018 को अनुबंध हुआ था। विभागीय प्रोजेक्ट समरी के अनुसार, 24 नवंबर 2020 को निर्माण कार्य पूर्ण बताया गया। परियोजना पर 188 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई। लेकिन निर्माण पूर्ण होने के दावे के बावजूद सड़क की मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है। सड़क के कुछ हिस्सों में क्षति दिखाई दे रही है और वहां मरम्मत का काम कराया जा रहा है। तस्वीरों में सड़क के बीच क्षतिग्रस्त हिस्से पर सीमेंट-कंक्रीट जैसी सामग्री डालकर पैचवर्क किया जाना साफ नजर आ रहा है।

सवाल यह है कि जिस सड़क को लंबे समय तक टिकाऊ और मजबूत बनाए रखने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उसमें इतनी जल्दी मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या निर्माण के दौरान निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन हुआ था? क्या सड़क की ऊपरी परत के साथ नीचे की संरचना की भी समुचित गुणवत्ता जांच की गई थी? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग की तकनीकी जांच और निर्माण संबंधी दस्तावेजों से ही सामने आ सकता है।

डामर की सड़क पर सीमेंट-कंक्रीट से मरम्मत, कैसी तकनीकी व्यवस्था?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल मरम्मत के तरीके को लेकर है। डामर की सड़क पर सीमेंट-कंक्रीट जैसी सामग्री से रिपेयरिंग किए जाने को लेकर तकनीकी उपयुक्तता पर सवाल उठ रहे हैं। कार्यपालन अभियंता रोशन कुमार साहू ने इस संबंध में बताया कि डामर की कमी के कारण ठेकेदार द्वारा मेंटेनेंस में कंक्रीट मटेरियल से रिपेयरिंग की जा रही है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या डामर की उपलब्धता नहीं होने पर सीमेंट-कंक्रीट से पैचवर्क करना तकनीकी रूप से उचित विकल्प है? क्या इस मरम्मत के लिए कोई स्वीकृत तकनीकी डिजाइन है? क्या पुराने और नए हिस्से के बीच उचित बॉन्डिंग तथा सड़क की सतह की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए जरूरी परीक्षण किए जा रहे हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क की मरम्मत का तरीका उसकी संरचना, क्षति की गहराई और खराबी के वास्तविक कारण पर निर्भर करता है। केवल ऊपर से सामग्री डालकर गड्ढा भर देना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। इसके लिए क्षतिग्रस्त हिस्से की जांच, कमजोर परतों को हटाना, उचित सामग्री का इस्तेमाल और निर्धारित तकनीकी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस सड़क पर किस मानक के अनुसार मरम्मत कराई जा रही है।

रात में सफर करने वाले यात्रियों की सुरक्षा भगवान भरोसे?

सड़क की गुणवत्ता के साथ-साथ यातायात सुरक्षा के इंतजाम भी सवालों के घेरे में हैं। बिलासपुर-मुंगेली राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई जरूरी स्थानों पर मील स्टोन और दिशा सूचक बोर्ड नहीं लगाए जाने की शिकायत सामने आई है। वहीं रोड मार्किंग और रेट्रो-रिफ्लेक्टिव व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

मील स्टोन और दिशा सूचक बोर्ड के अभाव में वाहन चालकों को रास्ते और दूरी का अनुमान लगाने में परेशानी होती है। खासकर रात के समय स्थिति अधिक जोखिमपूर्ण हो सकती है। रेट्रो-रिफ्लेक्टिव संकेतक और स्पष्ट रोड मार्किंग सड़क सुरक्षा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ऐसे में सवाल है कि जब सड़क को पूर्ण बताया गया, तो यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े ये जरूरी इंतजाम अब तक पूरी तरह सुनिश्चित क्यों नहीं किए गए?

ठेकेदार को दो बार नोटिस, फिर भी स्थिति में सुधार क्यों नहीं?

सड़क निर्माण और रखरखाव में लापरवाही को लेकर संबंधित विभाग द्वारा ठेकेदार अनिल बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड और सब ठेकेदार कन्हैया लाल अग्रवाल को दो बार नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद सड़क की गुणवत्ता, अधूरे निर्माण कार्य और मेंटेनेंस को लेकर सवाल बने हुए हैं।

यदि विभाग ने ठेकेदार को दो बार नोटिस जारी किया है, तो यह जानना भी जरूरी है कि नोटिस में किन कमियों का उल्लेख किया गया था? ठेकेदार की ओर से क्या जवाब दिया गया? क्या कमियों को दूर करने के लिए समयसीमा तय की गई? और यदि निर्धारित कार्य पूरे नहीं हुए, तो अब तक अनुबंध की शर्तों के तहत क्या कार्रवाई की गई?

सिर्फ नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि कमियों का स्थल निरीक्षण हो, तकनीकी जांच कराई जाए और लापरवाही प्रमाणित होने पर जिम्मेदारी तय की जाए।

एसडीओ को सड़क की लागत और निर्माण की जानकारी तक नहीं!

इस पूरे मामले में विभागीय निगरानी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। सड़क की रिपेयरिंग और सीमेंट-कंक्रीट पैचवर्क के संबंध में एसडीओ अतुल पैगवार से चर्चा की गई, तो उन्होंने सड़क की लागत, निर्माण पूर्ण होने और रिपेयरिंग कार्य की जानकारी नहीं होने की बात कही।

वहीं, सड़क निर्माण और वर्तमान स्थिति को लेकर इंजीनियर नरेंद्र खांडे से चर्चा की गई, तो वे भी तत्काल पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं करा सके। उन्होंने फाइल देखकर जानकारी देने की बात कही।

यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। करीब 188 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में जब सड़क की गुणवत्ता, निर्माण की समयसीमा और मौजूदा मरम्मत कार्य को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों के पास स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो फिर नियमित निगरानी किस स्तर पर की जा रही है? क्या निर्माण और मेंटेनेंस की समीक्षा केवल कागजों तक सीमित है या वास्तव में स्थल पर भी इसकी जांच होती है?

अब जांच और जवाबदेही से बच नहीं सकता विभाग

बिलासपुर-मुंगेली NH-130A का मामला केवल सड़क पर पैचवर्क किए जाने तक सीमित नहीं है। यह करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना की गुणवत्ता, निर्माण एजेंसी की जवाबदेही, विभागीय निगरानी और आम यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

अब संबंधित विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि सड़क का निर्माण पूर्ण होने के बाद किन-किन चरणों में गुणवत्ता परीक्षण किए गए? सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों की तकनीकी जांच किसने की? सीमेंट-कंक्रीट से मरम्मत कराने का निर्णय किसके निर्देश पर लिया गया? अधूरे साइन बोर्ड, मील स्टोन, रोड मार्किंग और रेट्रो-रिफ्लेक्टिव कार्य कब तक पूरे होंगे? दो बार नोटिस मिलने के बाद ठेकेदार के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई?

जरूरत है कि पूरे मार्ग का उच्चस्तरीय तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। सड़क की ऊपरी सतह के साथ सबग्रेड, सब-बेस और बेस लेयर की गुणवत्ता भी जांची जाए। मरम्मत कार्य की तकनीकी उपयुक्तता की पुष्टि हो और यदि निर्माण या रखरखाव में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित ठेकेदार एवं जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

आखिर सवाल जनता के करोड़ों रुपये और हजारों यात्रियों की सुरक्षा का है। निर्माण पूरा होने का दावा कागजों में हो सकता है, लेकिन सड़क की वास्तविक स्थिति सड़कों पर दिखाई देती है। अब देखना यह है कि एनएच विभाग इस मामले में केवल आश्वासन और नोटिस तक सीमित रहता है या वास्तव में जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी करता है।

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