
बोंदा में नए क्रशर के खिलाफ ग्रामीणों की लामबंदी, क्या रुकेगी एनओसी? प्रशासन के फैसले पर टिकी निगाहें
आबादी से 100–150 मीटर की दूरी पर क्रशर लगाने का दावा, स्कूल और छात्रावासों की मौजूदगी पर उठे सवाल; जनदर्शन में ज्ञापन सौंपकर ग्रामीणों ने मांगी अनुमति पर रोक
सारंगढ़ टाइम्स न्यूज | सारंगढ़।
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के सरिया तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत बोंदा के आश्रित ग्राम जोतपुर में प्रस्तावित नए क्रशर उद्योग को लेकर विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। गांव में पहले से तीन क्रशर संचालित होने का हवाला देते हुए ग्रामीणों ने चौथे क्रशर की स्थापना का विरोध किया है। बड़ी संख्या में ग्रामीण कलेक्टर जनदर्शन पहुंचे और प्रस्तावित क्रशर के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी नहीं करने की मांग उठाई। ग्रामीणों ने डिप्टी कलेक्टर राणा विजय से मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं और कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ग्रामीणों के इस विरोध का असर प्रशासन के फैसले पर पड़ेगा? क्या प्रस्तावित क्रशर की एनओसी रोक दी जाएगी, या ग्रामीणों को अपनी मांग मनवाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ेगा?
गांव में पहले से तीन क्रशर, चौथे की जरूरत क्यों?
ग्रामीणों का कहना है कि जोतपुर के आसपास पहले से तीन क्रशर संचालित हैं। उनके अनुसार, इनसे निकलने वाली धूल और मशीनों के शोर के कारण स्थानीय लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में एक और क्रशर स्थापित होने से प्रदूषण बढ़ने और जनजीवन प्रभावित होने की आशंका है।
ग्रामीणों ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और भूजल दूषित होने की आशंका भी जताई है। हालांकि, इन दावों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित विभागों की जांच और पर्यावरणीय आकलन महत्वपूर्ण होंगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब ग्रामीण पहले से ही प्रदूषण की समस्या का सामना करने की बात कह रहे हैं, तो प्रस्तावित क्रशर की अनुमति देने से पहले मौजूदा प्रदूषण की स्थिति का आकलन किया जाएगा या नहीं? क्या संबंधित विभाग यह जांच करेंगे कि क्षेत्र में एक और क्रशर स्थापित करना पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य के लिहाज से उचित है?
आबादी से महज 100–150 मीटर की दूरी का दावा, क्या जांच होगी?
ग्रामीणों के मुताबिक, प्रस्तावित क्रशर स्थल आबादी वाले क्षेत्र से लगभग 100 से 150 मीटर की दूरी पर है। इसी आधार पर उन्होंने ग्राम पंचायत से एनओसी जारी नहीं करने की मांग की है।
यदि प्रस्तावित स्थल की दूरी ग्रामीणों के दावे के अनुरूप है, तो यह विषय स्थल निरीक्षण और लागू पर्यावरणीय मानकों की जांच की मांग करता है। प्रशासन के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी कि किसी भी औद्योगिक गतिविधि की अनुमति देते समय स्थानीय आबादी, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर उचित विचार किया जाए।
अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों के दावों की मौके पर जांच कराएगा या एनओसी की प्रक्रिया सामान्य रूप से आगे बढ़ेगी?
स्कूल और छात्रावास पास होने का दावा, बच्चों के भविष्य की चिंता
ग्रामीणों ने प्रस्तावित क्रशर के विरोध में शिक्षा और बच्चों के स्वास्थ्य का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। उनके अनुसार, क्रशर स्थल के पास शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, हायर सेकेंडरी स्कूल तथा बालक और कन्या छात्रावास स्थित हैं।
ग्रामीणों को आशंका है कि क्रशर से निकलने वाली धूल और मशीनों का शोर विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा छात्रावासों में रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, उन्होंने पुराने सतनामी मोहल्ले का उल्लेख करते हुए कहा कि आसपास बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं।
ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या प्रस्तावित क्रशर की अनुमति से पहले स्कूलों, छात्रावासों और रिहायशी इलाकों की स्थिति का विस्तृत निरीक्षण किया जाएगा? क्या विद्यार्थियों और स्थानीय निवासियों पर संभावित प्रभाव का आकलन रिपोर्ट के आधार पर होगा?
जनदर्शन में ज्ञापन के बाद क्या होगी अगली कार्रवाई?
ग्रामीणों ने कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित क्रशर की अनुमति पर रोक लगाने की मांग की है। अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। ग्रामीणों की मांग पर संबंधित विभागों से जांच रिपोर्ट मंगाई जाती है या स्थल निरीक्षण के बाद निर्णय लिया जाता है, यह आगे स्पष्ट होगा।
इस मामले में केवल विरोध या मांग के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। प्रस्तावित स्थल की वास्तविक स्थिति, संबंधित अनुमति प्रक्रिया, पर्यावरणीय मानकों और ग्रामीणों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच के आधार पर ही निर्णय लिया जाना चाहिए।
बड़ा सवाल: ग्रामीणों की आवाज सुनेगा प्रशासन या उद्योग को मिलेगी मंजूरी?
जोतपुर में प्रस्तावित क्रशर का मामला अब केवल एक उद्योग की स्थापना तक सीमित नहीं रह गया है। ग्रामीण इसे अपने स्वास्थ्य, बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षित वातावरण से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं। वहीं, किसी भी औद्योगिक परियोजना के संबंध में निर्णय लागू नियमों और आवश्यक जांच के आधार पर होना चाहिए।
अब सवाल है कि क्या कलेक्टर जनदर्शन में उठी ग्रामीणों की आवाज प्रशासनिक कार्रवाई में बदल पाएगी? क्या प्रस्तावित क्रशर की एनओसी जारी करने से पहले सभी संबंधित पहलुओं की जांच होगी? और यदि ग्रामीणों की आशंकाएं जांच में सही पाई जाती हैं, तो क्या प्रशासन अनुमति रोकने या नियमानुसार आवश्यक कदम उठाने का निर्णय लेगा?
फिलहाल ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—जोतपुर में प्रस्तावित नए क्रशर की एनओसी जारी न की जाए। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मांग पर क्या निर्णय लेता है और ग्रामीणों के विरोध का वास्तव में कितना असर पड़ता है।



