Uncategorizedदेशराज्य

नवरात्रि के बाद बिखरते थे ज्योति कलश, संकल्प और श्रद्धा से बना धमधा का अनूठा कलश मंदिर

वर्ष 2010 में नरेंद्र बाबा की पहल से हुई स्थापना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं और विशिष्ट संरचना के कारण श्रद्धालुओं के बीच बनी विशेष पहचान

धमधा। नवरात्रि के नौ दिनों तक जिन ज्योति कलशों में श्रद्धालु माता की आराधना करते हैं, उन्हीं कलशों को नवरात्रि के बाद बिखरा देखकर उन्हें सहेजने का विचार एक अनूठे धार्मिक स्थल की स्थापना का आधार बना। छत्तीसगढ़ के धमधा स्थित कलश मंदिर की कहानी आस्था, सेवा, समर्पण और दृढ़ संकल्प की प्रेरक मिसाल है। वर्ष 2010 में नरेंद्र बाबा की पहल से स्थापित इस मंदिर ने अपनी विशिष्ट कलश संरचना और विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के कारण अलग पहचान बनाई है।

बिखरे ज्योति कलशों को सहेजने से आया मंदिर बनाने का विचार

मंदिर के संस्थापक नरेंद्र बाबा विभिन्न मंदिरों में नवरात्रि के दौरान सेवा कार्य किया करते थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि नवरात्रि संपन्न होने और ज्योति कलशों के विसर्जन के बाद कई कलश इधर-उधर बिखरे रह जाते हैं। जिन कलशों के सामने श्रद्धालु नौ दिनों तक दीप प्रज्वलित कर माता से अपनी मनोकामनाएं करते हैं, उनकी यह स्थिति देखकर नरेंद्र बाबा के मन में उन्हें एक स्थान पर सहेजने का विचार आया।

यही विचार धीरे-धीरे संकल्प में बदल गया। नरेंद्र बाबा ने आसपास के विभिन्न मंदिरों के संस्थापकों और सेवकों से संपर्क किया तथा नवरात्रि के बाद उपलब्ध होने वाले ज्योति कलशों को एकत्र करना शुरू किया। समय के साथ कलशों की संख्या बढ़ती गई और उन्हें एक विशिष्ट धार्मिक संरचना के रूप में विकसित करने की योजना तैयार हुई।

वर्ष 2010 में रखी गई मंदिर की नींव

नरेंद्र बाबा के निरंतर प्रयासों से वर्ष 2010 में कलश मंदिर की स्थापना की गई। एकत्रित कलशों को व्यवस्थित ढंग से एक-दूसरे के ऊपर रखकर मंदिर को विशेष स्वरूप दिया गया। इस पहल के जरिए नवरात्रि की धार्मिक परंपरा से जुड़े कलशों को स्थायी पहचान मिली।

शुरुआत में इस प्रयास को व्यापक सहयोग नहीं मिला, लेकिन नरेंद्र बाबा और उनके साथियों ने मंदिर की सेवा तथा विकास का कार्य जारी रखा। एक-एक कलश को सहेजकर धार्मिक संरचना खड़ी करने का यह प्रयास बताता है कि समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति से एक साधारण विचार को भी विशिष्ट पहचान दिलाई जा सकती है।

स्वप्न में मिले संकेत से जुड़ी है प्रतिमा स्थापना की मान्यता

कलश मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। मंदिर से जुड़े विवरण के अनुसार, नरेंद्र बाबा को स्वप्न में एक मूर्ति के संबंध में संकेत मिला था। बताया जाता है कि बेमेतरा जिले के रानो-जानो गांव में जमीन के भीतर एक मूर्ति मिली थी, जिसे ग्रामीणों की सहमति से मंदिर में स्थापित किया गया।

इसके बाद मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना का क्रम भी आगे बढ़ा। वर्तमान में यहां भगवान जगन्नाथ, भगवान गणेश, शनिदेव, संतोषी माता, दुर्गा माता, मां सरस्वती, भगवान श्रीकृष्ण, मां काली और भगवान हनुमान सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इनमें भगवान हनुमान को मंदिर के प्रमुख आराध्य के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है।

नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की आस्था

नवरात्रि के दौरान कलश मंदिर में विशेष धार्मिक वातावरण रहता है। ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। मंदिर से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इस अवसर पर दूर-दराज के क्षेत्रों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

नवरात्रि के दौरान भंडारे का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। धार्मिक आयोजनों के साथ सेवा और सहयोग की भावना मंदिर को विशेष बनाती है।

श्रद्धा के प्रतीकों को सहेजने की प्रेरक पहल

धमधा का कलश मंदिर केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि उस विचार की पहचान भी है, जिसने नवरात्रि के बाद बिखरने वाले ज्योति कलशों को सहेजने की प्रेरणा दी। नरेंद्र बाबा और उनके साथियों के निरंतर प्रयासों से विकसित यह मंदिर आज श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा केंद्र बन चुका है।

नवरात्रि में प्रज्वलित होने वाली ज्योतियां श्रद्धालुओं के लिए आशा, विश्वास और मनोकामनाओं का प्रतीक हैं। कलश मंदिर की यात्रा यह संदेश देती है कि श्रद्धा से जुड़ी परंपराओं को सहेजने का छोटा-सा प्रयास भी समय के साथ एक स्थायी और प्रेरणादायक पहचान बन सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

https://sarangarhtimes.in/wp-content/uploads/2026/03/Screenshot-2026-03-31-180014.png
Back to top button