
जीवनदीप समिति के वित्तीय रिकॉर्ड में बड़ी खामियां? ओपीडी राशि का कैशबुक और स्टॉक पंजी तक नहीं?

अनुविभागीय अधिकारी राजस्व ने तलब किया जीवनदीप समिति के दस्तावेज,
बीएमओ को दिया नोटिस, आज अभिलेख के साथ उपस्थित होने का निर्देश,
जीवनदीप समिति के राशि का बिना कार्यकारिणी समिति के अनुमोदन का व्यय का आरोप?
सारंगढ़ टाईम्स न्यूज/सारंगढ़,
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बिलाईगढ़ की जीवनदीप समिति के वित्तीय प्रबंधन और अभिलेख संधारण को लेकर गंभीर स्थिति सामने आई है। समिति के पिछले वर्षों के रिकॉर्ड की पड़ताल में ओपीडी से प्राप्त राशि, रोकड़ बही और सामग्री के स्टॉक से संबंधित महत्वपूर्ण अभिलेखों के संधारण में कमी सामने आई है। मामला स्वास्थ्य विभाग की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही से सीधे जुड़ा होने के कारण उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता दिखाई दे रही है। वही इस मामले मे अनुविभागीय अधिकारी राजस्व
बिलाईगढ़ ने बीएमओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया है तथा आज 14 अगस्त को अभिलेख के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में ओपीडी से प्राप्त राशि का समुचित रिकॉर्ड संधारित नहीं किया गया है। इसके अलावा अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक की रोकड़ बही (कैशबुक) भी संधारित नहीं की गई। किसी समिति के वित्तीय लेन-देन का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख रोकड़ बही होती है। इसमें प्रतिदिन प्राप्त राशि, भुगतान और शेष राशि का विवरण दर्ज किया जाता है। ऐसे में पूरे वित्तीय वर्ष की कैशबुक का संधारण नहीं होना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का विषय है।
ओपीडी से प्राप्त राशि के जमा को लेकर भी सवाल?
जीवनदीप समिति के खाते में ओपीडी से प्राप्त होने वाली राशि को लेकर भी वित्तीय रिकॉर्ड में स्थिति स्पष्ट नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ओपीडी से प्राप्त पूरी राशि समिति के बैंक खाते में जमा नहीं की जा रही है और खाते में जमा राशि तथा ओपीडी से प्राप्त वास्तविक राशि के बीच अंतर की स्थिति बनी हुई है। इसकी वास्तविक स्थिति ओपीडी रसीद बुक, दैनिक संग्रह रजिस्टर, बैंक स्टेटमेंट, जमा पर्चियों और कैशबुक का मिलान करने पर स्पष्ट हो सकती है। यदि प्राप्त राशि और बैंक में जमा राशि में अंतर मिलता है तो उसके
लिए जिम्मेदारी निर्धारित किया जाना आवश्यक होगा।
समिति के पैसों से खरीदी सामग्री का भी नहीं है स्टॉक रिकॉर्ड?
जीवनदीप समिति की राशि से अस्पताल के लिए विभिन्न सामग्रियों की खरीदी भी की जाती है। लेकिन वर्षों
से खरीदी गई सामग्री का विधिवत स्टॉक पंजी उपलब्ध नहीं होना भी गंभीर विषय है। स्टॉक पंजी के अभाव
में यह सत्यापित करना मुश्किल हो जाता है कि समिति की राशि से कब, कितनी और कौन-कौन सी सामग्री
खरीदी गई तथा वर्तमान में वह सामग्री अस्पताल में उपलब्ध है या नहीं।

वर्षों से निगरानी करने वाले अधिकारी भी रहे बेखबर?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जीवनदीप समिति के वित्तीय रिकॉर्ड और अभिलेख संधारण में वर्षों से चली आ रही इन कमियों के बावजूद संबंधित उच्च अधिकारियों की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यदि समिति के रिकॉर्ड में ओपीडी राशि, रोकड़ बही और स्टॉक पंजी जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं वर्षों से दुरुस्त नहीं हैं, तो इसकी नियमित निगरानी करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या संबंधित उच्च अधिकारी वर्षों से निद्रा में हैं, या फिर उन्हें समिति की वास्तविक वित्तीय स्थिति की जानकारी ही नहीं है? यह भी जांच का अहम विषय होना चाहिए। आखिर वर्षों से यदि रिकॉर्ड व्यवस्था में खामियां बनी हुई थीं तो समय-समय पर निरीक्षण और ऑडिट के दौरान इन्हें दूर क्यों नहीं कराया गया?
तीन वर्षों के रिकॉर्ड का विशेष ऑडिट जरूरी?
मामले में जीवनदीप समिति के पिछले तीन वर्षों के वित्तीय रिकॉर्ड का विशेष ऑडिट कराया जाना जरूरी है। इसमें ओपीडी से प्राप्त राशि, बैंक में जमा रकम, कैशबुक, भुगतान वाउचर, खरीदी के बिल, स्टॉक पंजी और समिति की बैठक में पारित प्रस्तावों का मिलान कराया जाना चाहिए। यदि जांच में वित्तीय राशि और अभिलेखों में अंतर सामने आता है तो संबंधित जिम्मेदारों की जवाबदेही तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही केवल रिकॉर्ड संधारण करने वाले कर्मचारियों की ही नहीं, बल्कि निगरानी और
पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जीवनदीप समिति मरीजों की सुविधा और स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से संचालित होती है। ऐसे में समिति की राशि के प्रत्येक रुपये का हिसाब पारदर्शी होना जरूरी है। अब देखना होगा कि इन गंभीर वित्तीय एवं अभिलेखीय कमियों पर स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी कब तक
संज्ञान लेते हैं और क्या कार्रवाई करते है?



