
पिकरी-बम्हनपुरी पुल निर्माण पर विकास मॉडल कठघरे में? बन रहा है करोड़ों का सेतु पर रास्ता सकरा? 242 लाख रूपये की लागत से बन रहा है पुल,

ठेकेदार मेसर्स अशोक केजड़ीवाल करा रहा है निमार्ण कार्य,
पुल के दोनो छोर पर सकरा रास्ता से आवागमन रहेगा बाधित?
सारंगढ़ टाईम्स न्यूज/सारंगढ़,
विकास का चेहरा अक्सर कंक्रीट, सरिया और विशाल व चौड़ी संरचनाओं में दिखता है, परंतु जब वही विकास ज़मीन की ज़रूरतों से कटकर खड़ा हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। पिकरी से बम्हनपुरी के बीच लोकनिर्माण विभाग (सेतु) द्वारा लगभग 2.42 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित हो रहा 90 मीटर लंबा और 8.40 मीटर चौड़ा पुल आज ठीक उसी बहस का केंद्र बन गया है। जिसमे निर्माण कार्य का ठेका सारंगढ़ की फर्म मेसर्स अशोक केजरीवाल को दिया गया है, परंतु जिस उद्देश्य से यह पुल बनाया जा रहा है,
उसकी प्रासंगिकता को लेकर ग्रामीणों में गहरी असहमति और आक्रोश है। ग्रामपंचायत बम्हनपुरी के सरपंच सहित कुछ ग्रामीणों ने जानकारी देते हुए कहा, कि जिस गांव को जोड़ने के लिए यह विशालकाय सेतु बनाया जा रहा है, वहां पुल पार करने बाद आज भी बस्ती मार्ग इतने संकरे हैं कि ट्रैक्टर तक का सुचारु आवागमन संभव नहीं वहीं बड़े चार पहिया व भारी वाहनों का प्रवेश लगभग असंभव है। ऐसे में 8.40 मीटर चौड़े पुल का निर्माण ग्रामीणों को विकास का प्रतीक कम और योजना की विसंगति अधिक प्रतीत हो रही है। उनका सीधा सवाल है-जब गांव की आंतरिक सड़कें ही दयनीय स्थिति में हैं, तो इतने चौड़े और लंबे पुल की वास्तविक उपयोगिता क्या है?

साहू समाज की श्मशान की भूमि हो रही प्रभावित-
बम्हनपुरी के ग्रामीणों और सरपंच ने आरोप लगाया है कि जिस स्थान पर पुल निर्माण हो रहा वह साहू समाज के श्मशान की भूमि है जिसके कारण साहू समाज की श्मशान भूमि प्रभावित हो रही है। यह केवल भौतिक क्षति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक आस्था और परंपरा से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वैकल्पिक डिजाइन या मार्ग संभव था, तो धार्मिक-सामाजिक स्थलों की सुरक्षा को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई? यह प्रश्न अब जनभावना का स्वर बनता जा रहा है।
पहले से उपलब्ध सेतु और मार्ग, फिर नया निर्माण क्यों?
बम्हनपुरी के ग्रामवासियों के अनुसार, पिकरी से लगभग 100–200 मीटर की दूरी पर पहले से सुगम सड़क मार्ग मौजूद है। वहीं लगभग 2 किलोमीटर दूर पहंदा मार्ग से बना सेतु पहले ही पिकरी और आसपास के गांवों को मुख्य सड़क नेटवर्क से जोड़ चुका है। ऐसी स्थिति में एक और 90 मीटर लंबे पुल की स्वीकृति को ग्रामीण दोहराव और अनावश्यक व्यय का उदाहरण बता रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि
संसाधन सीमित हैं, तो प्राथमिकता उन मूलभूत सुविधाओं को मिलनी चाहिए जो प्रतिदिन की ज़िंदगी को सुगम बनाती हैं-जैसे आंतरिक सड़क, नाली, जल निकासी और पेयजल। अब निगाहें लोकनिर्माण विभाग के जवाब पर टिकी हैं। क्या यह सेतु भविष्य की दृष्टि से दूरदर्शी योजना है, या फिर यह विकास के नाम पर खड़ी की जा रही एक अनुत्तरित संरचना? फिलहाल, पिकरी और बम्हनपुरी के बीच बन रहा यह
सेतु केवल दो गांवों को जोड़ने का प्रयास नहीं, बल्कि नीति-निर्माण और जमीनी सच्चाई के बीच की दूरी को उजागर करने वाली एक ठोस मिसाल बनता जा रहा है। और यही सवाल अब जनचर्चा से निकलकर सुर्खियों की मांग कर रहा है। इस मामले से जुड़े मूल तथ्यों की विस्तृत जानकारी हेतु विभाग के कार्यपालन अभियंता संतोष कुमार भगत से दूरभाष के माध्यम से सम्पर्क करने की कोशिश की गई पर
उनके द्वारा फोन रिसीव नही किया गया।



