
छत्तीसगढ़ में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे दावों के बीच राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा की तस्वीरों ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रसूता वार्ड में एक बेड पर दो-दो महिलाओं और उनके नवजात शिशुओं को रखे जाने का दावा सामने आया है। वहीं बेड की कमी के चलते मरीज और उनके परिजनों को फर्श पर बैठने और लेटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब राजधानी के बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों को पर्याप्त जगह नहीं मिल पा रही, तो दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति कैसी होगी ? अस्पताल के वार्ड से सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों और अस्पतालों की जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर बहस छेड़ दी है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सरकार और स्वास्थ्य मंत्री लगातार दावे करते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से इतर नजर आती है। सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्थाओं की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। हर बार ये भी देखा जाता है कि मंत्री और अधिकारियों के दौरे के दौरान कुछ घंटों के लिए अस्पतालों की व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाती है, लेकिन निरीक्षण टीम के लौटते ही हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। ताजा मामला प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा रायपुर का है। सोशल मीडिया पर अस्पताल के प्रसूता वार्ड का एक वीडियो वायरल होने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि बेड की कमी के कारण एक ही बेड पर दो-दो प्रसूताओं को लिटाया गया है।
अव्यवस्थाओं के बीच दोनों प्रसूताओं के नवजात शिशुओं की देखभाल कभी उनके परिजन तो कभी स्वयं प्रसूताएं करती नजर आ रही हैं। वहीं, प्रसूताओं की देखभाल के लिए अस्पताल पहुंचे परिजन भी पर्याप्त जगह नहीं मिलने के कारण फर्श पर बैठने और लेटने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि प्रसव के बाद महिलाओं को आराम, साफ-सफाई और उचित चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत होती है। नवजात शिशुओं के लिए भी सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण बेहद जरूरी है। ऐसे में यदि एक ही बेड पर दो प्रसूताओं को रखा जा रहा है और महिलाओं को फर्श पर लेटना पड़ रहा है, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि क्या मरीजों की बढ़ती संख्या के अनुरूप अस्पताल में बेड और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं? अगर संसाधनों की कमी है, तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है? और यदि समस्या लंबे समय से बनी हुई है, तो अब तक इसका समाधान क्यों नहीं हुआ?
स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे बनाम अस्पताल की तस्वीरें
सरकारें बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, मातृ स्वास्थ्य और नवजात शिशुओं की देखभाल को प्राथमिकता देने की बात करती हैं। लेकिन अस्पतालों में भीड़, बेड की कमी और मरीजों को होने वाली परेशानियों की तस्वीरें लगातार सामने आती हैं, तो इन दावों के क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मेकाहारा राजधानी का प्रमुख सरकारी अस्पताल है, जहां बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में यहां की व्यवस्थाओं को लेकर सामने आये इस वीडियों को केवल भीड़ का मामला बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अस्पताल में मरीजों की संख्या के अनुसार बेड, पर्याप्त जगह और स्वच्छता की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है। प्रसूता महिलाओं और नवजात शिशुओं को संक्रमण से बचाने के लिए अस्पताल में साफ-सफाई और संक्रमण नियंत्रण के मानकों का पालन जरूरी है। वार्ड में अत्यधिक भीड़ और सीमित जगह होने से इन व्यवस्थाओं को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सरकारी सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल
सोशल मीडिया पर मेकाहारा की वायरल वीडियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सम्मानजनक और सुरक्षित इलाज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा। क्या अस्पताल प्रबंधन को बेड की कमी की जानकारी है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इस स्थिति की समीक्षा की है? और मरीजों को राहत देने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? इन सवालों पर अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे अस्पताल में ऐसी ही स्थिति है, लेकिन प्रसूता वार्ड से जुड़ी शिकायतों की जांच और समाधान जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल यही है—जब बात मां और नवजात की सुरक्षा की हो, तो क्या स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे ही काफी हैं, या उनकी हकीकत भी बेहतर होनी चाहिए ? मेकाहारा की तस्वीरों ने व्यवस्था के सामने यही सवाल खड़ा किया है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए क्या बदलाव किए जाते हैं।



