
सारंगढ़-बिलाईगढ़ में फिर सामने आया लोन वसूली का फर्जीवाड़ा!

38 महिला हितग्राहियों से ₹10.51 लाख वसूलकर बैंक में जमा नहीं करने का आरोप, रिकवरी ऑफिसर के खिलाफ FIR
सरिया में भारत फाइनेंस-इंडसइंड बैंक के रिकवरी ऑफिसर पर गंभीर आरोप, BNS की धाराओं में मामला दर्ज
*सारंगढ़ टाइम्स न्यूज/सारंगढ़।*
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में महिलाओं को लोन दिलाने और उसकी किश्त वसूली से जुड़े मामलों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच *सरिया में भारत फाइनेंस इंक्लूजन लिमिटेड-इंडसइंड बैंक* के एक रिकवरी ऑफिसर पर 38 महिला हितग्राहियों से लाखों रुपये वसूलकर बैंक खाते में जमा नहीं करने का गंभीर मामला सामने आया है।
बैंक के ब्रांच मैनेजर *अमिताभ यादव* की शिकायत पर सरिया पुलिस ने आरोपी *दुर्गा प्रसाद चंद्रा* के खिलाफ *BNS की धारा 318(4), 316(5) एवं 61(2)* के तहत अपराध पंजीबद्ध किया है।
पुलिस शिकायत के मुताबिक आरोपी ने महिला हितग्राहियों से लोन की किश्त एवं लोन क्लोज कराने के नाम पर कुल *₹10,51,878* की राशि वसूल की, लेकिन कथित रूप से उक्त रकम बैंक में जमा नहीं की। शिकायत में यह भी आरोप है कि कुछ हितग्राहियों से राशि फोन-पे के माध्यम से ली गई।
रिकवरी ऑफिसर था, महिलाओं से किश्त वसूलने की थी जिम्मेदारी
ब्रांच मैनेजर की शिकायत के अनुसार आरोपी दुर्गा प्रसाद चंद्रा दिसंबर 2023 से सितंबर 2025 तक भारत फाइनेंस इंक्लूजन लिमिटेड-इंडसइंड बैंक, सरिया में फील्ड स्टाफ/कलेक्शन रिकवरी ऑफिसर के पद पर कार्यरत था।
उसकी जिम्मेदारी हितग्राही महिलाओं से लोन की किश्त एकत्र कर कंपनी में जमा कराने की थी। आरोप है कि इसी दौरान उसने *38 महिला हितग्राहियों से कुल ₹10,51,878* की राशि लोन क्लोज कराने या किश्त के नाम पर प्राप्त की, लेकिन बैंक में जमा नहीं की। शिकायत के मुताबिक आरोपी ने बाद में कंपनी की नौकरी छोड़ दी और *8 सितंबर 2025 को बिना सूचना दिए चला गया।*
मामले में पुलिस ने अपराध दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
लेकिन सवाल सिर्फ ₹10.51 लाख का नहीं…
सरिया का यह मामला सामने आने के बाद एक बार फिर जिले में *लोन के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले कथित फर्जीवाड़े और वित्तीय शोषण* की पुरानी समस्या चर्चा में आ गई है. सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में पूर्व में भी माइक्रोफाइनेंस, महिला समूहों और व्यक्तिगत ऋण से जुड़े विवाद एवं धोखाधड़ी के मामले सामने आते रहे हैं। कुछ मामलों में आरोपियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और जेल भेजे जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं ऐसे में सरिया का ताजा मामला केवल एक बैंक कर्मचारी पर लगे आरोप तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह उस बड़े संकट की ओर इशारा करता है जिसमें *कमजोर आर्थिक स्थिति वाली महिलाएं एक के बाद एक लोन लेने के बाद कर्ज के चक्र में फंसती जा रही हैं।*
एक लोन चुकाने दूसरा लोन… फिर बढ़ता जाता है कर्ज
जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में माइक्रोफाइनेंस एवं छोटे ऋणों की पहुंच बढ़ने के साथ महिलाओं के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी हुई है। कई परिवारों में एक से अधिक संस्थाओं से ऋण लेने की स्थिति बन जाती है। एक संस्था की किश्त चुकाने के लिए दूसरी जगह से कर्ज लेने की मजबूरी पैदा होती है और देखते ही देखते परिवार *कर्ज के जाल* में उलझ जाता है। जब आमदनी सीमित हो और किश्तें कई जगह की हों, तब बैंक एवं वित्तीय संस्थाओं की ओर से भुगतान का दबाव भी बढ़ने लगता है। ऐसे में यदि बीच में कोई वसूली एजेंट या कर्मचारी हितग्राही से पैसा लेकर उसे बैंक में जमा नहीं करता, तो नुकसान केवल बैंक का नहीं होता—*सबसे ज्यादा परेशानी उस महिला हितग्राही को होती है, जिसने यह मानकर पैसा दिया कि उसकी किश्त जमा हो गई है।*
पैसा देने के बाद भी बैंक का दबाव क्यों?
सरिया मामले में भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी महिला ने बैंक के अधिकृत रिकवरी कर्मचारी को राशि दे दी, तो उसके लोन खाते में वह रकम जमा क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित कर्मचारियों की वसूली प्रक्रिया की नियमित निगरानी होती है? क्या हर किश्त की डिजिटल रसीद तत्काल हितग्राही को दी जाती है? क्या बैंक यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारी के पास नकद या डिजिटल माध्यम से जमा हुई राशि उसी दिन खाते में दर्ज हो? और अगर ऐसा नहीं होता तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? महिलाओं के लिए सबसे जरूरी है—पैसा जमा करने का पुख्ता प्रमाण
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार लोन की किश्त जमा करते समय हितग्राहियों को बैंक की अधिकृत रसीद, डिजिटल ट्रांजेक्शन या खाते में अपडेट की पुष्टि जरूर रखनी चाहिए। किसी कर्मचारी के निजी मोबाइल नंबर या निजी डिजिटल वॉलेट में पैसा भेजना जोखिम पैदा कर सकता है।
फर्जीवाड़े के मामलों से जिले की छवि पर भी सवाल
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जैसे नए जिले के लिए यह बेहद चिंता का विषय है कि लगातार सामने आने वाले *लोन और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े मामलों* के कारण जिले की छवि पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रत्येक मामला अपने-अपने तथ्यों और जांच के आधार पर ही साबित होगा। लेकिन यदि लगातार अलग-अलग स्थानों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो प्रशासन और संबंधित वित्तीय संस्थाओं को इसे केवल व्यक्तिगत अपराध मानकर छोड़ने के बजाय *व्यापक स्तर पर समीक्षा* करनी चाहिए। क्योंकि मामला सिर्फ बैंक और आरोपी कर्मचारी के बीच का नहीं है। मामला उन *सैकड़ों-हजारों परिवारों* का है जो छोटे-छोटे ऋण लेकर अपने घर, बच्चों की पढ़ाई, खेती, व्यवसाय या रोजमर्रा की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।
प्रशासन और बैंकिंग संस्थाओं से अब जवाबदेही की मांग
ताजा मामले के बाद जरूरत है कि जिले में काम कर रही माइक्रोफाइनेंस एवं वित्तीय संस्थाओं की *कलेक्शन व्यवस्था, एजेंटों की नियुक्ति, महिला हितग्राहियों से वसूली की प्रक्रिया और शिकायत निवारण व्यवस्था* की समीक्षा की जाए।
साथ ही हितग्राहियों को यह भी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए कि—
* अधिकृत कर्मचारी की पहचान कैसे करें?
* किश्त जमा करने का सुरक्षित तरीका क्या है?
* निजी UPI/फोन-पे पर पैसा मांगने पर क्या करें?
* किश्त जमा होने के बाद बैंक खाते में उसकी पुष्टि कैसे करें?
* कर्मचारी द्वारा पैसा लेने के बाद खाते में जमा नहीं होने पर शिकायत कहां करें?
इन सवालों का जवाब जितनी जल्दी मिलेगा, उतना ही महिलाओं को इस तरह के कथित फर्जीवाड़े से बचाया जा सकेगा।
कर्ज महिलाओं के लिए सहारा बने, जाल नहीं
सरिया की घटना एक चेतावनी है। जरूरतमंद महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए दिया जाने वाला छोटा ऋण यदि अनियंत्रित कर्ज, वसूली के दबाव और कथित धोखाधड़ी का कारण बनने लगे तो पूरी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
अब देखना होगा कि सरिया पुलिस इस मामले की जांच में आरोपी तक पहुंचकर राशि की वास्तविक स्थिति सामने लाती है या नहीं और बैंक अपने स्तर पर उन *38 महिला हितग्राहियों* की शिकायत एवं ऋण खातों की स्थिति का क्या समाधान करता है।
क्योंकि सवाल ₹10.51 लाख का ही नहीं है—सवाल उन 38 महिलाओं के भरोसे का है, जिन्होंने बैंक के प्रतिनिधि को पैसा देकर यह उम्मीद की थी कि उनकी किश्त जमा हो रही है।



